रमण कौल | 3 जनवरी, 2010

कई साल पहले (2004 में) जब यह चिट्ठा शुरू हुआ तो यही कोई 20 चिट्ठाकार थे हिन्दी चिट्ठा जगत में — पाठकों की संख्या भी एकाध सैंकड़े से अधिक नहीं रही होगी। इन्तज़ार रहता था कि कोई लिखे तो हम पढ़ें और टिप्पणी करें। आजकी स्थिति, जब हज़ारों की संख्या में हिन्दी चिट्ठाकार हैं और शायद लाखों में पाठक हैं, तब एक स्वप्न लगती थी। सितंबर 2005 में लिखा यह लेख उस स्वप्न को दर्शाता है।

पिछले 2-3 वर्षों से मेरा लेखन बहुत ढ़ीला पड़ गया है। जब मैंने चिट्ठे पर लिखना छोड़ दिया, तो स्वाभाविक था कि पाठकों ने भी आना छोड़ दिया। इस बार नव वर्ष पर प्रण किया है कि नियमित लिखने लगूँगा। कोशिश करूँगा कि रोज़ एक प्रविष्टि लिखूँ। साथ में लेखन की गुणवत्ता बढ़ानी पड़ेगी क्योंकि अब पहले वाले गारंटीशुदा पाठक नहीं हैं — हज़ारों अन्य चिट्ठों और चिट्ठाकारों के बीच पाठकों के लिए रेस है।

आज साल का तीसरा दिन है, और यह मेरी तीसरी पोस्ट। स्टैटकाउंटर देखकर दिल डूब रहा है। इक्का-दुक्का पाठक गूगल के ज़रिए पुरानी प्रविष्टियों पर आए हैं, पर नई प्रविष्टियों पर ट्रैफिक शून्य के बराबर है। ज़ाहिर है, फिर से यहाँ जगह बनाने में समय लगेगा। पर इस बार मैं लगा रहूँगा.. अपने लिए।

मैं आजकल राजीव श्रीनिवासन के चिट्ठे का नियमित पाठक बन गया हूँ। राजीव एक 23 वर्षीय युवा चिट्ठाकार हैं – पर इस चिट्ठाकार के विषय में विशेष यह है कि यह जिस जगह से अपना ब्लॉग लिख रहे हैं, वह आजकल विश्व की सब से जोखिम भरी जगहों में से एक है। जी हाँ, राजीव अमरीकी थल सेना में लेफ्टिनेंट (या अमरीकी अंग्रेज़ी में – ल्यूटिनेंट) हैं, और आजकल पलटन कमांडर के रूप में कंदहार अफ्गानिस्तान में तैनात हैं।

राजीव का चिट्ठा मुझे तब मिला जब मैं अमरीकी फौज में भारतीय मूल के लोगों के विषय में जानने की कोशिश कर रहा था। यहाँ परदेस में यह देख कर तो अच्छा लगता है कि भारतीय मूल के लोग डॉक्टरी, सूचना-तकनीकी, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि क्षेत्रों में छाए हुए हैं, पर तब और अच्छा लगता है जब इस प्रकार भारतीयों को एक असामान्य क्षेत्र में देखते हैं।

पिछले महीने जब निदाल हसन नाम के एक फिलस्तीनी मूल के सैन्य मेजर ने अपनी ही सेना के लोगों पर गोलियाँ चलाईं, तो सेना में विदेशी मूल के लोगों के विषय में उत्सुकता हुई। उसी उत्सुकता के चलते इंटरनेट पर भारतीय मूल के लोगों के विषय में खोज की तो राजीव का चिट्ठा मिला।

पूरी परवरिश वर्जीनिया में होने के बाद भी राजीव अपने भारतीय मूल को नहीं भूले हैं। वे शुद्ध शाकाहारी हैं; जीवन और युद्ध के विभिन्न पहलुओं में भारतीयता और अपनी हिन्दू आस्था को भूलते नहीं। सब से बड़ी बात है कि युद्धक्षेत्र से भी अपना ब्लॉग लिखना नहीं भूलते।

ट्वेंटी समथिंग्स नाम के पोस्ट में राजीव अपनी ब्रिगेड के चैपलेन (सेना के प्रीस्ट) से जीवन मृत्यु के फलसफे के बारे में बात कर रहे हैं, और यहाँ तक कि उन्हें कृष्णार्जुन संवाद का फंडा समझा रहे हैं। ताता वाले पोस्ट में राजीव चेन्नइ में अपने दादाजी के निधन से चिन्तित हैं और उन के नाम एक निबन्ध समर्पित करते हैं – My Battle Within: The Identity Crisis of a Hindu Soldier in the U.S. Army (मेरे भीतर का युद्ध – अमरीकी सेना में एक हिन्दू सैनिक की पहचान का संकट)। इस निबन्ध को हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने पुरस्कृत भी किया है।

राजीव के कीबोर्ड में सरस्वती है, पर उन की हास्य भावना भी बहुत खूब है। हायर नाम के पोस्ट में वे लिखते हैं

“अरे, ब्रुक्स!” मैं ने टेंट के भीतर आवाज़ लगाई।

“रोजर, सर!” स्पेशलिस्ट (सिपाही) ब्रुक्स विनोद भरे अन्दाज़ से अपनी चारपाई से उछल कर सावधान की मुद्रा में आया, जिस से मुझे “मैश” टीवी सीरियल के घिसे पिटे सिपाहियों की याद आ गई। हँसी को रोकने की कोशिश में उसके होंठ काँप रहे थे।

“राष्ट्रपति को फोन लगाओ, अभी!”

“रोजर, सर, अभी लीजिए!”

शायद मैंने अपने पाठकों को अभी यह नहीं बताया कि FOB (Forward Operating Base) रैमरॉड में मेरी पलटन के टेंट में अमरीका के राष्ट्रपति के साथ सीधी फोन लाइन है। हाँ जी हाँ, बिल्कुल है। यह फोन एक भारी भरकम काला टचटोन फोन है, जो शायद मेरे पैदा होने से भी पहले खरीदा गया है। ब्रुक्स को हाल ही में घर से मिले पार्सल में प्राप्त चीज़ों में शायद यह सब से बेकार की चीज़ मिली होगी, पर हम ने इस को सही काम में लगा दिया।

इस से आगे वे ओबामा से अपने वार्तालाप के बारे में लिखते हैं। काफी मज़ेदार है, पढ़िए।

हाल के एक और पोस्ट (सिटिंग इंडियन स्टाइल) में राजीव बताते हैं कि कैसे एक अफ़गान सेना के कप्तान के सामने आलथी-पालथी मार कर बैठे और उनसे वह संबन्ध जोड़ा जो शायद एक गोरे सिपाही के लिए आसान न होता। और इससे अगले क्रम के पोस्ट में बता रहे हैं कि कैसे अफग़ानिस्तान में चौकड़ी लगाते लगाते उन के पैर सोने लगे हैं। इस लेख में मुझे उनका लिखा यह सुभाषित भी मिला, जो इस समस्या का अच्छा सार है।

We take people for face value because strong democratic countries allow us the freedom, if not the expectation, to be genuine.

राजीव अमरीकी सेना की प्रतिष्ठित वेस्ट पॉइंट मिलिट्री अकेडमी के ग्रैजुएट हैं। उन के लेखन को देखते हुए लगता है कि युद्घ के अनुभवों के आधार पर उन की लिखी पुस्तक शीघ्र ही उपलब्ध होगी। सैन्य अफसर, चिट्ठाकार होने के अतिरिक्त राजीव BeyondOrders.org को प्रारंभ करने में सहायक रहे हैं। यह साइट एक नॉन-प्रॉफिट संगठन की है जो ईराक और अफगानिस्तान में सैनिकों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करता है।

चलते चलते, राजीव के एक टीवी इंटरव्यू का यूट्यूब संस्करण

रमण कौल | 2 जनवरी, 2010

इस चिट्ठे को पढ़ने वाले सभी दोस्तों को नया साल मुबारक। इस दिन पर इस चिट्ठे पर बहुत दिनों बाद कुछ बड़बड़।

आज एक नई दहाई शुरु हुई है, जो उम्मीद है दुनिया के लिए कुछ खुश खबर ले कर आएगी। इस सदी की पहली दहाई में आतंक का ही बोलबाला रहा – 9-11, 26-11, 7-7, ईराक, अफगानिस्तान, ईरान, सूडान, और न जाने क्या क्या? पर घटनाएँ आम तौर पर अंकों की मोहताज नहीं होती। समयचक्र के लिए एक नई दहाई शुरू होने का कोई अर्थ नहीं है। विश्व घटनाक्रम के लिए 1 जनवरी 2010, ऐसा ही है जैसा कोई और दिन। इसलिए यह उम्मीद करना कि दहाई बदलने से घटनाक्रम बदल जाएगा, खुद को झूठी तसल्ली देना ही है। मैं अंकविद्या में विश्वास नहीं करता, इस कारण व्यक्तिगत जीवन मे सदी या दहाई बदलने से कुछ होगा, यह नहीं मानता।

यह नई दहाई है या नहीं, यह भी बातचीत का विषय हो सकता है। यह शताब्दी 2000 में शुरू हुई थी या 2001 में? भई देखा जाए तो 31-दिसंबर-2000 बीसवीं शताब्दी का अन्तिम दिन था, और उसी तर्क से 31-दिसंबर-2010, इस शताब्दी की पहली दहाई का अन्तिम दिन होगा। दूसरी ओर अंग्रेज़ी भाषी परेशान हैं कि इस दशक को क्या कहा जाए – भई 80s थे, फिर 90s आए, उसके बाद अभी यही समझ में नहीं आ रहा था कि पहले दशक को क्या कहा जाए, कि दूसरा दशक भी आ गया। 10s कहना तो सही नहीं होगा – पर कोई बात नहीं – उस शब्दावली से यह नई दहाई शुरू हुई है।

अपने लिए यह पिछली दहाई बहुत परिवर्तन की रही। 2000 में ही भारत से आए, साल भर कैनेडा में रहने के बाद यू.एस. में पैर जमाए। अब पैर तो लगभग जम गए, दिल अभी नहीं जमा।

इस नए साल की शुरुआत आम सालों की ही तरह हुई — सुबह के डेढ़ बजे पार्टी से लौटे। होशोहवास बराबर रखने, क्योंकि घंटे भर की ड्राइविंग कर के घर पहुँचना था — वह भी बहुत खराब मौसम में। शून्य के आसपास तापमान, वर्षा के साथ हल्का हल्का हिमपात भी हो रहा था, पुलिस वाले चौकन्ने हो कर ताक लगाए बैठे थे कि कौन लेन से भटके कि उन्हें धर पकड़ें।

नए साल के साथ स्वयं से वादा है इस चिट्ठे पर नियमित लिखने का। आज पहले दिन कुछ खास नहीं, बस यही कि नए साल की शुरुआत कैसे हुई।

श्री शिवा-विष्णु टैंपल

kdk_0445कुछ मित्रों का फोन आया, पहली जनवरी को मन्दिर जाना चाहते थे। देखते देखते तीन युगल इकट्ठे हुए और श्री शिवा-विष्णु टैंपल का कार्यक्रम बना। यह मन्दिर वाशिंगटन डीसी की बेल्टवे (मुद्रिका मार्ग) के पास है, और मेरे घर से कोई 50 मील दूर। बहुत भीड़ थी आज। मन्दिर के अहाते की पार्किंग फुल थी, और मन्दिर के बाहर का पार्किंग लॉट भी फुल था। बहुत दूर जा कर पार्किंग कर के आना पड़ा, और फिर ठंड में पैदल मन्दिर तक पहुँचना पड़ा।

शिवा-विष्णु मन्दिर पर एक दक्षिण भारतीय मन्दिर की झलक है। अन्दर के हॉल में कई छोटे छोटे मन्दिर हैं। प्रवेश करते ही एक शीशे के डिब्बे में ओबामा देवता की भी फोटो देखी। दरअसल यह फोटो उस दिन ली गई थी जब व्हाइट हाउस में दीवाली मनाई गई थी और इस मन्दिर ने दीपक, मिठाई और पुरोहित उपलब्ध कराए थे।

खैर मन्दिर में दर्शनाभिलाषियों ने दर्शन किए, भोजनाभिलाषियों ने भोजन किया ;-) । अब इतनी दूर आए थे तो सोचा कि पास के थिएटर में थ्री ईडियट्स देखी जाए।

थ्री ईडियट्स

थ्री ईडियट्स की बहुत प्रशंसा सुनी थी, और फिल्म उस प्रशंसा पर खरी उतरी। शायद ही कोई और फिल्म देखी हो, जो शिक्षाप्रद होने के साथ साथ इतनी मनोरंजक भी हो। पूरा हॉल हँस हँस कर लोटपोट हो रहा था। कुछ मज़ाक फूहड़ किस्म के थे, पर यह ज़माने की माँग है। फिल्म सोचने पर मजबूर करती है — अपनी करीयर चॉइसेज़ याद आती हैं, क्या सही किया, क्या ग़लत, बच्चों की करियर चॉइस में हमारा क्या रोल रहता है, वह याद आता है।

यूँ लगता है कि यह दशक हिन्दी फिल्मों के लिए काफी अच्छा रहा। पिछले दिनों तीन फिल्में देखीं और तीनों लीक से हटकर थीं – पा, रॉकेट सिंह, और अब थ्री ईडियट्स।

एक बार फिर नया साल मुबारक।

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रमण कौल | 15 अगस्त, 2009

बासठवें स्वतन्त्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर एक बार फिर पढ़िए आज से चार वर्ष पहले लिखी यह पोस्ट जिस में मिले सुर मेरा तुम्हारा के हर भाषा के बोल संकलित किए गए थे। आज एक और छोटी सी सूचना, समय-लाइव के सौजन्य से

शास्त्रीय गायक दिवंगत पंडित पी. वैद्यनाथन और लुई बैंक्स द्वारा संगीतबद्ध मिले सुर मेरा तुम्हारा गीत ने दूरदर्शन के छोटे पर्दे को अचानक नयी ऊचाई पर पहुंचा दिया था।

यह गीत जब भी सुनता हूँ, मन को भा जाता है। यदि किसी को गीत से विभिन्न भाषाओं के गायकों के नाम भी मालूम हों तो कृपया बताएँ। कुछ स्वर जो इस में सुनाई दिए थे, वे हैं – भीमसेन जोशी, लता मंगेशकर, बालमुरली कृष्ण, आदि। इन गायकों के अतिरिक्त कुछ चेहरे जो दिखे थे वे हैं कपिल देव, कमल हासन, तनुजा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन, जीतेन्द्र, मिठुन चक्रवर्ती। जो चेहरे और स्वर मैं नहीं पहचान पाया हूँ, उन के विषय में सूचना मिलेगी तो आभारी रहूँगा।

गीत का ऑडियो (एमपी3) और वीडियो एक बार फिर प्रस्तुत है

listen सुनने के लिए क्लिक करें (mp3 डाउनलोड करने के लिए माउस का दायाँ बटन दबाएँ)

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रमण कौल | 6 अगस्त, 2009

श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार ग्रेटर कश्मीर का ई-पेपर संस्करण देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है।


Urdu Ad in GreaterKashmir.com Newspaper against use of plastic bags

श्रीनगर म्यूनिसिपल कार्पोरेशन

पाकीज़ा शहरे-श्रीनगर को मनहूस पॉलीथीन के ज़हर से
पाक रखने के लिए 14 लाख शहरियों को मुबारकबाद

खबरदार, अभी भी चन्द इस्तेहसाल पसन्द अनासिर इस मनहूसियत को वापस
लाने की ताक में हैं।
उन से बचिए, वह आप के दुशमन हैं।
आप किसी भी दुकानदार को पॉलीथीन बेचते हुए पकड़ कर उसे नज़दीकी पोलीस
स्टेशन या म्यूनिसिपल वार्ड में लाएँ।
जो शख्स पॉलीथीन पकड़वाने में मदद करेगा उसे म्यूनिसिपल हुक्काम की तरफ़ से
इनाम दिया जाएगा।
जो शख्स अब पॉलीथीन बैग हाथ में लेकर चलेगा या पॉलीथीन के ज़हर में कोई शै
बेचे, उस पर 5000 रुपए का जुर्माना आयद किया जाएगा और
उस के ख़िलाफ़ म्यूनिसिपल अदालत में केस दायर किया जाएगा।

मेयर …………. कमिश्नर
म्यूनिसिपल कार्पोरेशन …………. म्यूनिसिपल कार्पोरेशन

यानी अब श्रीनगर की पुलिस और स्थानीय सरकार न केवल उन लोगों पर मुकद्दमा चलाएगी जो पॉलीथीन बैग में सामान बेचेंगे, बल्कि उन पर भी जो ऐसी थैली में सामान घर ले जाते हुए पकड़े जाएँगे। वाह री सरकार, आतंकियों को तो पकड़ नहीं पाते हो, आम जनता को लूटने का एक और तरीका खोज निकाल लिया। श्रीनगर को सिंगापोर बनाने का इरादा लगता है मेयर और कमिश्नर साहिबान का।

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